नमाज़ की फजीलत . जानिए और शेयर कीजिये.

By | June 12, 2017

इस्लाम में नमाज़ हर मुसलमान मर्द औरत पर फ़र्ज़.
हर मुसलमान मर्द औरत को यह मान लेना चाहिए की इमान और अकीदो को सही कर लेने के बाद सब फर्जो में  सबसे बड़ा फ़र्ज़ नमाज़ है .

क्योंकि कुरआन मजीद और हदीसों में बहुत जयादा बार इसकी ताकीद आई है. याद रखो की जो नमाज़ को फ़र्ज़ न माने या नमाज़ की तौहीन करे या नमाज़ को एक हलकी और बेकदर चीज समझ कर उसकी तरफ ध्यान न दे वह काफ़िर और इस्लाम से खारिज है |

और जो सख्स नमाज़ ना पड़े वह बहुत बड़ा गुनाहगार और अजाबे दोजख का हकदार है, और वह इस लायक है की बादशाहे  इस्लाम पहले इसको सजा से, फिर भी वह नमाज़ न पढ़े तो उसको कैद कर दे ,यहाँ तक की तौबा करे और नमाज़ पड़ने लगे |

शरीयत का ये मसला है कि  जब बच्चा 7 साल  का हो जाए तो उसको नमाज़ सिखा कर नमाज़ पढने का हुकम दे, और जब बच्चे की उम्र 10 साल की हो जाए तो मार -२ उसे नमाज़ पढवाए| (तिरमिज़ी जिल्द -1, सफा -54).

मसला- : नामज़ खालिश इबादत बदनी है , इसमें नियाबत  जारी नही हो सकती, यानि उसकी तरफ से दूसरा कोई नहीं पढ़ सकता, जिंदगी में नामज़ के बदले कुछ माल बतौर फिदिया अदा करके नमाज़ से छुटकारा हासिल कर ले – हाँ अलबत्ता किसी पर कुछ नमाज़े रह जाई और वह इन्तेकाल कर गया और वसीयत कर गया की उसकी नमाज़ का फिदिया किया जाये तो उम्मीद है की इन्साल्लाह यह कबूल हो | और यह वसीयत भी वारिशो को इसकी तरफ से पूरी करनी चाहिए की कबूल हो |

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