इस्लाम में हज की फ़ज़ीलत : जानिए. और शेयर करें

By | June 13, 2017
इस्लाम में हज की फ़ज़ीलत : जानिए.

इस्लाम में नमाज़ रोज़े जकात की तरह हज भी इस्लाम का एक रुक्न है. इसका फ़र्ज़ होना कतई और यकीनी है. जो इसके फ़र्ज़ होने  का इंकार करे वो काफ़िर है.  इसकी अदा  करने में देर करने वाला गुनहगार और इसको तर्क करने वाला अज़ाबे जहन्नुम का सज़ावार है|

अल्लाह पाकं ने कुरआन मजीद में इरशाद फ़रमाया “हज व उमरा को अल्लाह के लिए पूरा करो”.

अहादीस में हज व उमरा के अजरो सवाब के बारे में बड़ी – बड़ी बशारतें आई हैं, मगर हज जिंदगी में बस एक ही बार फ़र्ज़ है.

हदीस  1 : – रसूलल्लाह  ﷺ  ने इरशाद फ़रमाया कि जिसने हज किया और हज के दौरान बुरे कामो से दूर रहा तो वह इस तरह गुनाहों से पाक व साफ़  होकर लौटा जैसे उस दिन माँ के पेट से पैदा हुआ था . ( बुखारी , मुस्लिम शरीफ, मिश्कात – जिल्द – 1, सफा – 221 ) .

हदीस 2 : – हज व उमरा मुहताजी और गुनाहों को इस तरह दूर करते है जैसे भट्टी लोहे , चांदी और सोने के मैल को दूर करती है और हज करने का सवाब का जन्नत ही  है.

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